Tuesday, February 28, 2017

पृथ्वी का अमृत-तिल का तेल सर्वोत्तम खाद्य पदार्थ




*पृथ्वी का अमृत..
सफ़ेद तिल 

कला तिल 
तिल का तेल...*

( 5 मिनिट का समय निकाल कर पोस्ट को जरूर पढ़े )

यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है, और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं, क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है। 
तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे। 
तिल के तेल में इतनी ताकत होती है, कि यह पत्थर को भी चीर देता है। प्रयोग करके देखें.... आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा का का वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... लेकिन... अब आप उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा। यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है। तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती में अहम भूमिका अदा करता है।  
तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है। तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी। तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए, लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी (लकडी की बनी हुई) का ही प्रयोग करना चाहिए।  
तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".
तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है। यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता। 
सौ ग्राम सफेद तिल 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है।
काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है, जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।
तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।
तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।
तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।
इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते। ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।
तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।
यह कब्ज भी नहीं होने देता।
तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।
तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं, इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।
सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी। जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी। यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े। 
एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा। ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें। यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा। जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ। 

तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।
कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है-
तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।
तनाव को कम करता है-
इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।
हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है। 
शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-
तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।
शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-
अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।
अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-
तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा का वैसा ही रहता है। 
तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर में काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।
 तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।
जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए। इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है। 
हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनायें और जीवन निरोग बनायें।

Saturday, February 25, 2017

National Portal of India - सभी सेवाएं एक ही जगह।

सभी सेवाएं एक ही जगह। https://services.india.gov.in

भारत सरकार ने लगभग 2000 सेवाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध करवाई है।  लेकिन हम जानकारी के अभाव में आज भी इधर उधर भटकते रहते है। कुछ जरुरी सेवाओं की सूचि यहाँ उपलब्ध है।

1. Apply for jobs on National Career Service Portal          https://www.ncs.gov.in/Pages/default.aspx

ऊपर दिए गए लिंक पर आप भारत सरकार व केन्द्र सरकार के उपक्रमों में निकलने वाली विभिन्न नियुक्तियों के न लाइन फार्म भर सकते है। 

2. Apply online for new PAN card or corrections in PAN card https://www.onlineservices.nsdl.com/paam/endUserRegisterContact.html

ऊपर दिए गए लिंक पर आप ऑनलाइन पैन कार्ड के लिए अप्लाई कर सकते है। अपने पुराने पैन कार्ड की जानकारी बदलने के लिए या उपडेट करने की लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकते है। 

 3. Apply & search student scholarships online
 https://www.vidyalakshmi.co.in/Students

ऊपर दिए गए लिंक पर जाकर आप अपने बच्चों को विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाली स्कॉलरशिप के लिए ऑन लाइन आवेदन कर सकते है। 

4. Apply for Indian Visa online 

https://indianvisaonline.gov.in/visa/index.html
भारत से बहार रहने वाले वीसा के लिए ऑन लाइन अप्लाई करने के लिए ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक करके अप्लाई कर सकते है। 

5. Apply for Jeevan Pramaan - Digital Life Certificate for Pensioners
https://jeevanpramaan.gov.in
 ऊपर दिए लिंक पर आप अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र बनवा सकते है। 

6. Marriage Registration, India
http://www.registermymarriage.com
ऊपर दिए लिंक पर आप अपनी शादी को रजिस्टर करवा सकते है। 

7. Obtain driving licence online https://sarathi.nic.in:8443/nrportal/sarathi/HomePage.jsp

ऊपर दिए गए लिंक पर आप अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकते है। 

8. Apply for Adhar card

https://uidai.gov.in/new
ऊपर दिए गए लिंक पर आप अपना आधार कार्ड बनवा सकते है।

9. Apply for online Voter registration forms and guidelines, Indiahttp://www.nvsp.in/forms
 ऊपर दिए गए लिंक पर आप चुनाव पहचान पत्र बनवा सकते है।
10. Get Tatkal passport in Indiahttps://portal2.passportindia.gov.in/AppOnlineProject/user/RegistrationBaseAction?request_locale=en
ऊपर दिए गए लिंक पर तत्काल पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकते है। 

11. Registere your vehicle online

https://parivahan.gov.in/vahanservice/vahan/ui/usermgmt/login.xhtml
ऊपर दिए गए लिंक पर आप अपने वाहन का रजिस्ट्रशन व उसका टैक्स भर सकते है। 

12. Search pin code or post office name

https://www.indiapost.gov.in/VAS/Pages/FindPincode.aspx
आपको कहीं का भी पिन कोड देखना हो तो ऊपर दिए गए लिंक को यूज़ करें।

13. IFSC codes

www.ifsccodebank.com
ऊपर दिए गए लिंक पर आप अपने बैंक का IFSC कोड प्राप्त कर सकते है। 





Thursday, February 23, 2017

शिव कौन है ? मृत्यु क्या है ? Who is Lord Shiva ?

जमाना रंग अपना कुछ न कुछ सब पर चढ़ाता है। 
मगर कुछ लोग रंग अपना चढ़ाते है ज़माने पर।।
अमल से जिंदगी बनती तो हम सब ही बना लेते। 
नवाजिश जब तलक उसकी न हो, कुछ हो नहीं सकता ।।





यह कहानी स्वामी दयानंद के बचपन की है। उनके हदय में ऊपर लिखी दो जिज्ञासाएँ उत्पन्न हुयी थी।  इन जिज्ञासाओं का समाधान खोज कर उन्होंने ज़माने पर अपना रंग चढ़ा ही दिया।
गुजरात (काठियावाड़)राज्य में टंकारा नाम का एक छोटा सा नगर है। यहाँ आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व एक ब्राह्मण परिवार रहता था। इस परिवार के मुखिया कर्षण जी थे। यह परिवार धन धान्य से संपन्न था। कर्षण जी शिव भक्त थे। उनके घर फाल्गुन कृष्ण दशमी संवत १८८१ विक्रमी (सन १८२४) में एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम मूलशंकर रखा गया।
किसी को क्या पता था की यह बालक संसार को जीवन ज्योति प्रदान करेगा। पाखण्डो में फंसे हुए लोगो को ज्ञान का प्रकाश देकर सन्मार्ग पर चलाएगा।
पिता पौराणिक परिपाटी के शिवभक्त थे, अतः वे पुत्र को भी अपने जैसा ही शिव भक्त बनाना चाहते थे।
बालक मूलशंकर की बुद्धि तीव्र थी, अतः उसने बाल्यावस्था में ही पुराणों की अनेक कथाएं याद कर ली, साथ ही दस वर्ष की अवस्था तक संस्कृत के कई छोटे छोटे ग्रन्थों को भी पढ़ लिया। घर के वातावरण ने उन्हें पूरी तरह शिव पर श्रद्धा रखने वाला भक्त बना दिया। वे प्रतिदिन मंदिर जाकर शिव की अर्चना करते और "ऊँ नमः शिवायः " मंत्र का जाप करते थे।
एक साधारण सी घटना के कारन मूलशंकर के जीवन में एक नया मोड़ आ गया।  शिव रात्रि का अवसर था। परिवार में सबने बड़ी श्रद्धा से शिव रात्रि का व्रत रखा। पिता ने इन्हे भी कहा, "बेटा मूल ! तुम भी शिव रात्रि का व्रत रखो। व्रत रखने से देवताओं के देवता, महादेव शिव शंकर प्रसन्न होंगे। वे सारे संसार के स्वामी हैं। तुम्हे बहूत पुण्य मिलेगा। शिव जी के दर्शन होंगे। "
इस उपदेश को सुनकर मूलशंकर ने भी श्रद्धा पूर्वक व्रत रख लिया। सारा दिन कुछ खाया पिया नहीं। सायंकाल होते ही पिता के साथ वह शिव पूजन के लिए मंदिर में पहुँच गया। उसने सारी रात जागकर शिव की पूजा करने का निश्चय किया। उस समय मूलशंकर की आयु ११ वर्ष की थी।
दिन भर निराहार रहकर मूल शंकर ने शिव पुराण की कथा सुनी। स्वंय भी शिव स्त्रोत का पाठ किया। उसके ह्दय में भक्ति का अथाह समुद्र हिलारें ले रहा था। पिता के समान उसने भी शिव पूजन सामग्री अर्पित करते हुए शिव पूजन किया। एक पहर बीत गया।  दूसरे पहर का पूजन आरम्भ हुवा। जब तीसरे पहर का पूजन आरम्भ हुवा तो भक्त लोग खर्राटे भरने लगे।
मंदिर में सन्नाटा छाया हुवा था। परन्तु मूलशंकर सच्ची श्रद्धा के साथ शिव की सेवा में जाग रहा था। उसे भय था की कही सो जाने के कारण व्रत भंग न हो जाये और वह व्रत के पुण्य से वंचित न रह जाये।  उसी समय एक अद्भुत घटना घटी।  इस घटना ने बालक मूलशंकर के हदय में एक क्रांति की लहर उत्पन्न कर दी। उथल पुथल मचा दी।
एक चूहा मंदिर में से किसी बिल से निकल कर महादेव जी की मूर्ति पर आ चढ़ा और उस पर चढ़ाये हुये फलों को खाने लगा। यह देखकर बालक मूलशंकर के मन में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होने लगे। क्या यह वही शिव है जो संसार को चलते हैं? क्या ये सच्चे शिव है ? यदि यहाँ सच्चे शिव होते तो क्या यहाँ छोटा सा चूहा इस तरह अपमान कर पता ? शिव पुराण में तो इन्हे दैत्यों का विनाश करने वाला कहा गया है। तो क्या संसार का उत्पादक,पालक और संहारक शिव कोई और है ? यदि वह है तो कौन है ?
अपनी शंकाओ के समाधान के लिए मूलशंकर ने समीप ही सो रहे पिता जी को जगाया। कर्षण जी उसके प्रश्नों का उतर न दे सके। उन्होंने झुंझला कर शिव के बारे में ऐसी बातें न करने को कहा। परन्तु मूलशंकर अब भी सोच रहा था, की यह सच्चा शिव नहीं हो सकता। जो अपने ऊपर से एक छोटे से चूहे को नहीं हटा सकता वह हमारी और संसार की रक्षा कैसे कर सकता है। इसी उद्दिग्नता में वह मंदिर से उठकर घर चला आया। पानी पीकर व्रत तोड़ दिया। मूलशंकर के मन में अब सच्चे शिव को पाने की लगन उत्पन्न हो चुकी थी।  सच्चा शिव कोन है? उसका रंग रूप क्या है? वह कहाँ रहता है? उसे किस प्रकार पाया जा सकता है? इन विचारों ने मूलशंकर को संसार की चहल पहल से उदासीन बना दिया। इस घटना के पश्चात मूलशंकर ने अपना मन पढ़ाई -लिखाई में लगा लिया।
लगभग दो वर्ष बाद एक रात मूलशंकर अपने संबंधियों के साथ किसी मित्र के घर में कोई खेल तमाशा देखने गया हुवा था।
वही उसे पता चला की उसकी बहन को हैजा हो गया है। वैधों ने उसकी बहन को बचाने का पूरा प्रयास किया , परंतु वह बच न सकी। मूलशंकर ने अपनी आँखों से यह पहली मृत्यु देखी थी। जिस बहिन को चार छह घंटे पहले वह हंसती खेलती छोड़ कर गया था, वह अब दुनिया से उठ गयी। घर के लोगों ने रोना पीटना शुरू कर दिया परन्तु मूलशंकर दीवार से लगा हुवा चुपचाप मृत्यु के बारे में सोचता रहा।
कुछ समय और बीता और फिर एक दिन उसके चाचा भी परलोक सिधार गए। मरने से पहले चाचा ने मूलशंकर को बड़ा प्यार दिया था। उनके मरने पर मूलशंकर भी फूट फूट कर रोया। जबकि बहिन के मरने पर वह सोचता ही रहा था। बहिन की मृत्यु पहला धक्का था। चाचा की मृत्यु दूसरा धक्का बन गई। वह सोचने लगा यह सब क्या है। क्या सभी को एक न एक दिन मरना है। क्या मैं भी ऐसे ही मर जाऊंगा।  आखिर मृत्यु क्या है ? क्या मनुष्य इससे मुक्त नहीं हो सकता ?
मूलशंकर को वैराग्य होने लगा। वह घर बार छोड़कर सच्चे शिव की खोज में निकल गए।  मूलशंकर ही बाद में दयानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

Thursday, February 16, 2017

ईश्वर कहाँ है ?

ईश्वर कहाँ है ?
 भोलेनाथ , शिव , शिवम् , महादेव, महेश
माता-पिता और आचार्य ये तीनों गुरु कहलाते हैं। माता पहला गुरु है। बच्चे को पहली शिक्षा माता से ही मिलती है माता बच्चे को व्यावहारिक शिक्षा देती है। उसे अपने शरीर के अंगों का, सगे सम्बन्धियों का, बच्चे के संपर्क में आने वाले पशु पक्षियों का ज्ञान कराती है। उसे उठना बैठना, हँसना, बोलना, दूसरों का आदर करना व स्नेह करना सिखाती है।
माता पुत्र को जो शिक्षा देती है, उसमें पिता भी सहयोग करते हैं। जब बच्चा बड़ा होता है तो उसकी जिज्ञासाएं भी बढ़ने लगती है। इन जिज्ञासाओं को उन्नत और प्रोत्साहित करने की मुख्य जिम्मेदारी पिता की होती है, माता सहयोग करती है। आचार्य का शिक्षा सम्बंधित उत्तरदायित्व उपनयन संस्कार के साथ या यों कहे कि विद्यालय में प्रवेश के साथ आरम्भ होता है।
पुराने समय में बड़ो के प्रति शालीनता के तथा ईश्वर भक्ति के संस्कार बचपन में ही डाल दिए जाते थे। ईश्वर कैसा है? कहाँ रहता है? क्या करता है? आदि बातें बच्चा पिता से ही सीख लेता है। उन दिनों आजीविका की समस्या इतनी विकट नहीं थी।  पिता को इतना समय आसानी से मिल जाता था कि वह पुत्र की शंकाओ का निवारण कर सके तथा साथ साथ उसमें अच्छे संस्कार डाल सके।
उसी समय के एक पुत्र ने पिता से पूछा कि --"पिता जी, हम परमात्मा को मानते हैं।  वह सब कुछ बनाता है।  सब कुछ देखता है। उससे कोई वस्तु, कोई बात छिपी नहीं है।  वह दयालु है और कल्याणकारी है। हमें जन्म देने वाला, पालने वाला और मिटाने वाला भी वही है। वह हमारे भले बुरे सब तरह के कर्मो को देखता है और उनका उचित फल देता है, ऐसा भी हम मानते है. पर वह रहता कहाँ है? और कैसा है? यह हम नहीं जानते। आपको यह सब मालूम होगा अतः मुझे भी बताइये। "
पिता ने कहा --"बेटा ! परमात्मा सब जगह रहता है. संसार के कण कण में उसका निवास है। पर वह निराकार है। निराकार होने के कारन वह हमें दिखाई नहीं देता। इन कानों से हम उसकी आवाज नहीं सुन सकते। हमारा हाथ उसे छू नहीं सकता। ये आँखे उसे देख नहीं सकती। रसना या जीभ उसे चख नहीं सकती। नाक से उसे सूँघा नहीं जा सकता। उसे बुद्धी के द्वारा विचारा जाता है। मन से मनन किया जाता है। आत्मा से अनुभव किया जाता है। योग साधना से पाया जा सकता है। कहा है ---

हर जगह मौजूद है, पर वह नजर आता नहीं। 
योग साधना के बिना, उसको कोई पाता नहीं।।

पुत्र ने कहा --"में समझ नहीं पाया।  कुछ और खोलकर समझाइये। "
पुत्र को समझने के लिए पिता ने एक मुठी नमक लिया और उसे दिखाकर वह नमक पानी से भरे हुए एक शीशे के जग में डाल दिया।  पानी को हिलाकर उसने पुत्र को कहा --"देखो, और बताओ, नमक कहाँ है? पुत्र ने कहा कि नमक तो पानी में मिल गया। " पिता ने पूछा "दिखता है?" पुत्र ने उत्तर दिया, "दिखता तो नहीं, अदृश्य हो गया है। "."पर है या नहीं ?" "है तो ""कहाँ?" "सारे पानी में" पिता ने कहा --"बेटा ! इस नमक को आँखों से नहीं देखा जा सकता पर इस पानी की हर बून्द में नमक है।  नमक के होने को पानी का स्वाद बताएगा, हमारी आंखे नहीं बताएंगी। परमात्मा भी इसी प्रकार सारे संसार में है, कण कण में है, सभी वस्तुओं में है।  पर उसे हमारी  जीभ भी नहीं बता सकती। नमक पहले दिख रहा था, अब नहीं दिख रहा। किन्तु परमात्मा को कभी भी आँखों से या दूसरी बाहरी इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता।  उसे अंदर की आंख से अपने ही अंदर देखा जा सकता है।जब उसके दर्शन हो जाते है तो फिर तो सब जगह वह ही वह दिखाई देता है.
दही में घी है पर दिखाई नहीं देता है। उसे निकलने के लिए दही को मथना पड़ता है। तिलों में तेल है पर दिखता नहीं। तेल पाने के लिए तिलों को पेलना पड़ता है। लकड़ी और पत्थर में छिपी आग को देखने  के लिए उसे रगड़ना पड़ता है। इसी प्रकार हमारे अंदर व बहार के संसार में उस परमात्मा को अंदर की आँखों से देखने के लिए योग की आवश्यकता है। उसे ध्यान के द्वारा देखने के लिए अनुभव करने के लिए आत्मा व परमात्मा के मेल की साधना की आवश्यकता है। "
पिता के इस प्रकार समझाने पर पुत्र समझ गया कि सब जगह रहते हुए भी परमात्मा दिखाई क्यों नहीं देता, और उसे कैसे देखा जा सकता है।

शिक्षा
हमरा अच्छा या बुरा कोई भी काम परमात्मा कि नजर में है।  बुरे काम का बुरा फल मिलता है।  अतः हमें सदा अच्छा काम ही करना चाहिए क्योंकि ईश्वर सब कुछ देख रहा है।  

Sunday, February 12, 2017

Valentine day and .........?

वेलेंटाइन और हम भारतीय। 
वैलेंटाइन डे आप कैसे मनांते हैं? क्या है इसमें, ये किसकी परम्परा है ? ये कहाँ से खड़ा हुवा था ? इटली में पैदा हुवा एक साधारण इंसान। कट्टर ईसाई।  वैलेंटाइन उन्होंने एक लड़की के साथ शादी की थी। वहां के राजा को ये नागवार गुजर था। वे उन्हें ईसायियत से और इस तरह के प्रेम आचरण जो की आने वाली पीढ़ी को गलत सन्देश देने वाली थी, से बहार करना चाहते थे। तात्कालिक परिस्थितियों में राजा गलत नहीं थे। 14 फरवरी को उनकी मौत हुयी और वहां का एक समुदाय विशेष इसे एक उत्सव के रूप में मनाने लगा।  धीरे धीरे समय ने करवट ली। जो समुदाय विशेष इसे शुरू में मनाने लगा था, वो वहां का शक्तिशाली समुदाय था। इसे एक त्यौहार के रूप में मनाने लगा। देखा देखी वहां का निम्न वर्ग शक्तिशाली समुदाय के निकट आने की जुगत में उनका अनुसरण करने लगा। शक्तिशाली समुदाय ने उन्हें स्व संत घोषित कर दिया। तदुपरांत यूरोप भयंकर सक्रमण काल से गुजरा और लोग भूल गए।  परम्परा चलती रही। संत की उपाधि लग चुकी थी। यूरोपीय लोग अपनी परम्पराओ से बहूत प्यार करते है। हम भारतीय उनकी नक़ल करते है। ओधोगिक विकास ने माइग्रेशन को बढ़ावा दिया।  भारतीय पूरी दुनिया में आने जाने लगे। जो ओधोगिक विकास में उन्नति करते गए, उन्होंने वहां की परम्परा को अपनाना शुरू कर दिया। उनके कारण ये संस्कृति भारत में आ गयी।

यक्ष प्रश्न 
हम क्यों मनाएं ?
कौन मर गया जिसकी याद में हम 14 फरवरी को ये दिन मनाने लगे ? कोनसा इतिहास आप के घर में रचा गया जिसकी याद में वेलेंटाइन डे मना रहे हो ? शादी का दिन मना लेते। पति व पत्नी का प्रेम तो सदैव होना चाहिए, प्रतिपल होना चाहिए। वो मात्र चमड़ी का नहीं, दिल का होना चाहिए।  ह्रदय की गहराइयों से उत्पन्न प्रेम ही अजर अमर प्रेम होता है। क्या साबित करना चाहते हो ? कभी नुमाइश की है अपने प्रेम की ? झूट सब झूट। शादी के बाद कब आपने अपनी पत्नी से प्रेम का इजहार किया ? मृगतृष्णा में जी रहे हो ? जो नहीं मिला उसके पीछे भाग रहे हो ? हम सब चमड़ी के पुजारी हैं। इसलिए आप और मैं घिनोने इंसान है। मुझे माफ़ करना हम सब चमड़ी पसंद करने वाले लोग है। हम सब लोग सिर्फ खूबसूरती देखते है। नैन, नक्स देखते है, होठ देखते है, स्टाइल पर मरते है, अदाओं पर मरते है, फिगर देखते है, गाल कैसे है ? नाक कैसा है, बाल कैसे हैं ? रंग कितना गोरा है? कितनी मधुर सुरीली आवाज़ है ? कितने बेशर्म, बेहया लोग है, हम। क्यों ? क्योंकि, हम हवस के पुजारी है। इसलिए ये सब दिखता है। और अपनी अतृप्त इच्छा की पूर्ति करने के लिए इस दिन का इंतजार करते है। इसीलिए वहां के तत्कालीन राजा ने उन्हें निष्कासन दिया था। सही किया था उन्होंने दूरदर्शी थे, आने वाले दुष्परिणामों से वाकिफ थे।  आज देख लो परिणाम आप के सामने है।

हमारे प्यार का तकाजा,प्यार का अर्थ, प्यार का रूप भी सिर्फ चमड़ी तक ही सिमित हो गया है। अगर उसके आगे आप का प्यार है तो वेलेंटाइन डे की जरुरत नहीं है। हमारे माता -पिता भी आपस में प्यार करते थे एक दूसरे से।  मेरी और आप की माँ भी प्यार करती थी अपने पतियों से। हमारे पिता भी प्यार करते थे। क्या कभी ऐसा किया था उन्होंने। गुलाब के फूल नहीं थे क्या ? इत्र नहीं था क्या ? सब था सिर्फ इजहार करने का तरीका ये नहीं था। हम मुर्ख लोग किस परम्परा का पालन कर रहे हैं ?

उस वक्त इजहार करने के लिए बॉडी स्प्रे, परफ्यूम, महंगे गिफ्ट, सैम्पू, महंगी ज्यूलरी, होटल संस्कृति, वो महंगे बाथ टब नहीं रहे होंगे जिसमें साथ स्नान कर सकें खूबसूरती के अन्य अंदाज नहीं रहे होंगे। कुछ नहीं था। तो क्या हमारे माँ बाप ने प्यार नहीं किया था?
जीवन की पवित्रता थी, समर्पण का भाव था, अर्धाङ्गिनी का वो रूप रहा होगा, वो गहरी आत्मीयता रही होगी, वो दिल रहा होगा, वो प्यार रहा होगा, वो घनिस्टता रही होगी।  मेरा ये मानना है, की हम में से अधिकांश के माँ बाप ने अभी तक माँ ने बाप को नहीं छोड़ा है, और बाप ने माँ को। ना तलाक दिया ना एतराज किया। ना हमारी माँ हमारे बाप को छोड़कर पीहर गयी। ना हमारे पिता ने हमारी माँ को घर छोड़कर जाने के लिए कहा, भले ही मेरे पिता नाटे रहे होंगे या आप में से बहुतों के पिता दुबले पतले रहे होंगे। माँ दुबली पतली रही होगी, नाटी रही होगी और भी असमानताएं रही होंगी लेकिन फिर भी आप देख रहे हो ये जोड़ियां आज भी कायम हैं। जिसके परिणाम के रूप में आप और मै हूँ।
भले पिता काले रहे होंगे, भले माँ ठिगनी रही होंगी, पिता लंबे रहे होंगे।  पिता मंद बुद्धि रहे होंगे माँ लूली रही होंगी। कितनी ही असमानताएं रही होंगी लेकिन उन जोड़ो को आज भी आप देख रहे होंगे। आज भी कामयाब है।
आज तो हम इंच इंच देखते है, सेंटीमीटर में देखते है। नाक नक्स देखते है।  आज हम देखते है, कि इसकी ऑंखें बराबर नहीं है, उसके होठ बराबर नहीं है, वो बोलती है, तो ऐसे ऐसे बोलती है, या जो वो है ना वो भेंगा देखता है, चलने में थोड़ा प्रॉब्लम है, रंग भी सांवला है, सूंदर नहीं है इसलिए मुझे पसंद नहीं है।

अरे डूब मरो शर्म करो बेहूदे इंसानो। इंसानो के रूप में भेड़ियों। चमड़ी के पुजारियों हम दिल कब तलाशेंगे।  हम अछी सोच कब तलाशेंगे।  हमारे संस्कार तो ये नहीं है। हमारी व्यवस्थाएं कब लागु करेंगे? इंसानियत के तौर पर इस दुनिया में ज्ञान का दिया कब जलाएंगे। सब का मन तो पवित्र नहीं हो सकता सब साधु तो नहीं बन सकते, सब साध्वियां तो नहीं बन सकती, लेकिन स्नातन धर्म का अगर थोड़ा सा भी अंश तुम में बाकि है तो आंखे खोलो !!!!
हर कोई त्यागी बन कर इस मार्ग पर नहीं चल सकता। शादी करना जीवन की आवश्यकताओं में से एक है ये मैं मानता हूँ। अधिकांश लोग गृहस्थ जीवन यापन करेंगे। शादी करेंगे, पाणिग्रहण होगा और घर बस जायेगा।  घर बसने के बाद कौन क्या कर रहा है ये उस पर छोड़ दो। समाज में रहना है तो व्यवस्थाएं अपनांनी होंगी। लेकिन ये पहले क्या कर रहे हो मुर्ख लोगो।   
14th February 

Thursday, February 9, 2017

शेखवाटी में शादी कैसे होती है ?

शेखावाटी, शादी और डांस।
भारत के विभिन्न प्रान्तों में विवाह की अलग अलग रश्मे है। हर प्रान्त में विवाह के लिए कुछ रश्मों व रीति -रिवाजों को अपनाया गया है। हर जगह के रीति रिवाज अपने आप में खास है। भारत में विवाह एक खास अवसर है। आज हम यहाँ शेखावाटी में विवाह की कुछ रश्मों के बारे में जानते है।

1 . सगाई
शेखावाटी में विवाह से पहले लड़का और लड़की के परिवार आपस में मिलकर सगाई की रस्म पूरी करते हैं , जो लगभग पूरे भारत में एक समान ही है।  यानि हर प्रान्त में सगाई की रस्म होती है।  लेकिन शेखावाटी में ये परिवार के ही सदस्य आपस में एक दूसरे को बताते हैं , की फलां गांव में लड़की है, या लड़का है।  फिर लड़के या लड़की के घर वाले अपने कुछ निकट सम्बन्धियों को लेकर उस गांव में जाते है।  पहले लड़की वाले लड़के के घर जाते थे।  आजकल लिंगानुपात में गिरावट होने की वजह से लड़के वाले लड़की के घर जाते है। लड़की को देखने से पहले ही उसके बारे में पड़ताल कर ली जाती है।  उसके घर जाने का मकसद ये होता है की लड़की वाले राजी हो जाएँ और हमारे लड़के को देखने आ जाएँ। फिर लड़की वाले लड़के के घर वालों व लड़के के बारे में जाँच पड़ताल कर के उसके घर जाते है।  अगर लड़का व उसका परिवार ठीक ठाक है व लड़की वालों की कसौटी पर खरा उतरता है, तो ही ये परम्परा निभायी जाती है, वरना बिचोलिये के माध्यम से कहलवा दिया जाता है की, अभी लड़की पढ़ रही है।  जब लड़का व उसके परिवार वाले लड़की वालों की कसौटी पर पूरा बैठेते है तो, लड़की वाले लड़के वाले के घर जाकर लड़के से पूछताछ करते है। अगर उन्हें थोड़ा बहूत भी शक होता है तो घर की महिलाओं से पूछ ताछ की जाती है।  अगर विरोधाभाष मिलता है तो उस वक्त तो वे ये अहसास नहीं कराते की हमारे सम्बन्ध जचां नहीं।  ये काम घर आने के बाद बिचोलिये के माध्यम से करवा दिया जाता है। अगर लड़का फिट है तो एक तारीख तय की जाती है, उस तारीख पर लड़के के परिवार व नजदीक के पुरुष रिस्तेदारों को लड़की वाले अपने यंहां आमन्त्रित करते है, व सब को खाना खिलाकर, तिलक वगैरह करके बाकायदा झुंवारी (नकद राशि ) कम्बल , महिलाओं के कपडे देकर विदा कर दिया जाता है। फिर 2 -3 महीने या कई बार ज्यादा समय निकाल कर लड़का या लड़की वाले परिवार की तरफ से पहल कर विवाह की तारीख तय कर ली जाती है। इस दौरान किसी भी परिवार की तरफ से अगर कोई ऊंच नीच बात सुनने में आती है तो सगाई टूट जाती है।
इस प्रकार सगाई की रस्म पूरी होती है।
2 . ब्याह मांडना (विवाह तय करना)
सगाई के बाद विवाह तय किया जाता है, जिसमें गुप् चुप तरीके से ये पता लगाया जाता है की लड़की वाले दहेज में क्या क्या दे सकते है? अगर लड़के वालों को लगता है की कम है, तो लड़की वालों पर रिस्तेदारों के द्वारा दबाव बनाया जाता है।  अगर इस में कामयाबी नहीं मिलती तो रूठने मनाने की प्रकिर्या की जाती है। कभी कभी इसकी वजह से सगाई भी टूट जाती है। फिर भी जब कामयाबी मिल जाती है, या नाकाम होने पर भी विवाह तय हो जाता है तो ये आगे चलकर दुखदायी हो जाता है। खैर दोनों परिवार के प्रमुख लोग मिल कर एक तारीख तय करते है और उस दिन विवाह की तैयारी करने लगते है।
3 . विवाह कार्ड 
विवाह की तारीख तय होते ही विवाह कार्ड छपवा लिए जाते है।  और अपने अपने रिस्तेदारों की लिस्ट बना ली जाती है, जिन्हें शादी में आमन्त्रित करना है। फिर उनको कार्ड वितरित किये जाते है।  ये काम जिस दिन बान बैठाया जाता है, उस दिन से पहले कार्ड को गणेश जी के नाम से भेजकर बाकि कार्डों को लिस्ट के अनुसार वितरित किया जाता है। इसे कुकुपत्री कहते है।
4 . बान बैठना    
विवाह के कुछ दिन पहले लड़के व लड़की वाले अपने यंहां पंडित से पूछ कर बान बैठने की रस्म का इंतजाम करते है।  पंडित के द्वारा शुभ मुहूर्त देखकर 4-5 दिन पहले का समय दिया जाता है। उस दिन पंडित लड़के वाले के घर आकर विधि विधान से पूजा करके मन्त्रोचारों के साथ बान बैठने की रस्म पूरी करवाता है।  उधर लड़की के गांव में उनका पंडित भी ऐसी ही रस्म करवाता है। इसको अलग अलग प्रान्तों में अलग अलग तरह से पूरा किया जाता है। कहीं पर जनेऊ धारण करवाई जाती है। कहीं पर लगन बोला जाता है।  लेकिन शेखावाटी में प्रायः यहीं किया जाता है। बान बैठने के बाद लड़का व लड़की अपने गांव की सीमा से बहार (निकासी से पहले) नहीं जा सकते, लेकिन आज कल ये परम्परा कहीं पीछे छूट गयी है। अब 4-5 दिन लड़का अपने परिवार के अलग अलग घरों में घूमकर खाना खाता है। उसके साथ बिनाकिया एक छोटा लड़का होता है। जो बान बैठने के दिन से उसके साथ रहता है, गणेश जी के प्रतीक के रूप में।
5 . मेल 
इस दिन लड़के वाले अपने गांव व बिरादरी के लोगों के लिए सामूहिक रूप से भोज का आयोजन करते है।  जिसे प्रीतिभोज कहते हैं। नाना प्रकार के पकवान बनाकर अपने गांव व बिरादरी के लोगों की खूब आव भगत की जाती है।  कुछ समुदायों में तो 8000-10000 लोगों तक का खाना बनता है। आम तोर पर 3000 लोग ऐसे आयोजन में शामिल होतें है। इस परम्परा पर शेखावाटी में बहूत धन खर्च किया जाता है। धीरे धीरे ये एक अनावश्यक परम्परा बनती जा रही है।
प्रीतिभोज
6 . डान्स    
प्रीतिभोज वाले दिन लड़के वाले के यहाँ गांव व बिरादरी के लोगों द्वारा नाच कर ख़ुशी जाहिर की जाती है। ये काम दिन में महिलाओं के द्वारा चाक पूजने की परम्परा के साथ किया जाता है। जिसमें महिलाओ के द्वारा DJ sound पर भयंकर डांस करके ख़ुशी जाहिर की जाती है।  

शाम के समय परिवार, रिस्तेदारों  व लड़के के दोस्तों के द्वारा DJ sound पर डांस किया जाता है।
7. निकासी
दूसरे दिन लड़के को दूल्हे के रूप में सजा कर परिवार, रिस्तेदार, समाज के लोग व लड़के के खास दोस्त बारात के रूप में लड़की के गांव के लिए रवाना होते है जिसे निकासी कहते है। इसमे शेखावाटी में गाड़ियों का काफिला जितना बड़ा होता है उतनी ही बारात अच्छी मानी जाती है।
इस दौरान घर, गांव  व शादी में शामिल होने आई महिलाओं के द्वारा गीत गाकर बारात को रवाना किया जाता है।  घर से रवाना होकर दूल्हा गांव के मंदिर में जाकर आशीर्वाद लेता है।
उसके बाद लड़की के गांव के लिए बारात रवाना हो जाती है।




8. बारात आगमन  
जब लड़के वाले बारात लेकर लड़की के गांव पहुँचते है, तो नाई भेजकर लड़की के घर सुचना दी जाती है।  उसके बाद बारातियों को अल्पाहार करवाया जाता है।

इस प्रकार लड़का बारात लेकर लड़की के घर पहुँच जाता है। अब आगे की रश्मों, रिवाज व परम्परा के लिए अगले अंक का इंतजार करें।
मुझे कमेंट करके अवश्य बताएं कि शेखावाटी की शादी कैसी लगी ?
धन्यवाद !


Sunday, February 5, 2017

बता मेरे यार सुदामा रै…..


स्कूल की छात्राओं का YouTube पर धमाल, डाला ऐसा गाना, 81 लाख ने सुना


भगवान कृष्ण और सुदामा पर सरकारी स्कूल की लड़कियों दुवारा गाया गया गाना सोसल मीडिया पर धमाल मचा रहा है। ये गीत इन दिनों यू-ट्यूब और तमाम दूसरी साइट्स पर भी छाया हुआ है। रोहतक के सांघी गांव के डॉ. स्वरूप सिंह गवर्नमेंट मॉडल संस्कृति स्कूल की 9वीं, 10वीं और 11वीं की छात्राओं द्वारा गाए गए इस गीत ‘बता मेरे यार सुदामा रै…..भाई घणे दिना में आया’ को लगभग 81 लाख लोग सुन चुके हैं।
संगीत के साथ पढ़ाई में भी अव्वल ये बच्चियों विधि, ईशा, शीतल, मनीषा, मुस्कान और रिंकू को सराहना के फोन देश के कोने-कोने से आ रहे हैं। इन बच्चियों ने अपनी कामयाबी का श्रेय माता- पिता और म्यूजिक टीचर सोमेश जांगड़ा को दिया है।आप भी जब इस गाने को सुनेंगे तो बस सुनते ही रह जाओगे।जिस तरह से इन लड़कियों ने ये गाना गाया है इस गाने की मिठास दिल को सीधा छू रही है। एक बात तो है भारत में प्रतिभा की कमी बिल्कुल भी नही है और उस प्रतिभा को सोसल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिला है जिसने पुरे भारत से चुन चुन कर प्रतिभाशाली लोगों को नए मुकाम तक पंहुचा दिया है।

Thursday, February 2, 2017

शेखावाटी - मंडावा

शेखावाटी मंडावा 
शेखावाटी मंडावा  में भर्मण के लिए आज अपन मंडावा की सैर करेंगे।
मंडावा पहुँचने के लिए आप को जयपुर से लगभग 200 किमी का सफर करना पड़ेगा।  अगर आप देहली की तरफ से आते है तो, आप को लगभग 275 -280 किमी का सफर करना पड़ेगा। मंडावा शेखावाटी के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है।  विदेश से आने वाले पर्यटको के मानचित्र में जयपुर के बाद दूसरे स्थान पर आता है। मंडावा शेखावाटी के लगभग मध्य में स्थित है।  यहाँ की आबो हवा उष्ण कटिबंधीय होने के कारन फरवरी मार्च का महीना भर्मण के लिए बहूत ही उत्तम है। मंडावा आने वाले पर्यटक मंडावा , नवलगढ़ , फतेहपुर , इन तीन स्थानों को अपनी लिस्ट में प्रमुखता से रखते है।

क्या क्या देखें।
1. मंडावा फोर्ट
18 वीं. शताब्दी का मंडावा का किला जो वहां के शासक ठा. नवल सिंह ने बनवाया था।  ठा. नवल सिंह मंडावा के आलावा नवलगढ़ ठिकाने के भी राजा थे। किला बहूत ही सूंदर नक्कासी, गुम्बद, मीनारो के साथ बना हुवा है. आज भी अपने उसी स्वरूप में है।
मंडावा किले का आंतरिक भाग 
 2. मंडावा का चार बुर्ज कुआँ
ये कुआं जिसके चार बड़ी बड़ी मीनारें है, वास्तव में देखने लायक है। उस ज़माने की  कलाकृतियों में से एक सूंदर कलाकृति। इसके साथ साथ मंडावा के आस पास के गॉंवों में भी इस तरह के सूंदर दृश्य देखने को मिल जायेंगे।  पिछले साल की सलमान खान अभिनीत फिल्म बजरंगी भाई जान की शूटिंग मंडावा के पास स्थित एक गांव हनुमान पूरा में हुयी थी।  यहाँ के चप्पे चप्पे में आर्ट है।  इसीलिए इसे ओपन आर्ट गैलरी के नाम से भी जाना जाता है।
चार मीनार वाला कुआँ
3. हवेलियां
हवेलियों में यहाँ पर शराफ़ों की हवेली, गोयनका हवेली, झुंझुनूवाला की हवेली प्रमुख हैं।
मुख्या बाजार का दृश्य 
ऐतिहासिक दृष्टि से मंडावा शेखावाटी क्षेत्र का ही भाग है और यह राजस्थान में अपनी खूबसूरत हवेलियों और जीवंत भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्द है। गुजरात और दिल्ली के मध्य रास्ते में पड़ने वाले इस शहर से पुराने समय में मध्य-पूर्व एशिया और चीन के व्यापारी इसी मार्ग से आते जाते थे जिसकी वजह से यह व्यापार का मुख्य केंद्र बन गया था। पर समय के साथ-साथ यहाँ के धनी वयापारी दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों की ओर प्रस्थान करने लगे। लेकिन उनहोंने मंडावा में जो हवेलियाँ बनवाई थीं, वे आज भी अपने वैभव से पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। इन हवेलियों की चित्रकारी और पच्चीकारी पुरे विश्व भर में प्रसिद्द हैं।



Wednesday, February 1, 2017

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें
आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें।  आज के दिन से प्रकृति अपना सौन्दर्य निखारने लगती है जो लगभग तीन महीने तक चरम पर रहेगा।  उसके बाद गर्मियों की ऋतु में धीरे धीरे इसके सौन्दर्य में थोड़ी कमी आती है, जो वर्षा ऋतु में पुनः लौट आती है।
स्वास्थ्य के लिए
प्राकृतिक रूप से ये 2 -3 महीने स्वास्थ्य के लिए बहूत महत्वपूर्ण होते है।  जिस तरह से प्रकृति में बदलाव आता है, वैसे हम अपने स्वस्थ्य में भी बदलाव ला सकते है। जैसे पेड़ों पर नयी कोंपल, फूल पत्तियां आती है, वैसे ही हमारे शरीर में भी रक्त का बदलाव होता है। अगर इस समय को हम थोड़ी सी सावधानी के साथ औषधीय र्रोप से लें तो प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहेंगें।
मानसिक रूप से तनाव मुक्त रहने के लिए उत्तम समय है। ग्रंथों में वसंत के मौसम को सारी ऋतुओं का राजा इसीलिए कहा है।

प्रकृति का जादू 
जब हम जंगल, समंदर, नदी किनारे या पहाड़ पर फूलों को देखते हैं, तो मन को एक तरह का सुकून मिलता है।  प्रकृति की यह विविधता देखकर हम आश्चर्य से भर जाते है।  कितने ही दुखी हों, घने जंगल, कुदरती बाग़ में चले जाइये।  पेड़ के पत्तों के 10 तरह के हरे रंग देखिये एक आंतरिक शांति मिलेगी मनोविज्ञान की भाषा में समझे तो पर्यावरण के बीच जाने पर दिमाग को ताजगी मिलती है।  वहां हमारे पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को विश्वास होता है, की कोई आपसे बड़ा और बेहतर है , वो हमारे पक्ष में है। पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम आपको शांत रखता है इसके साथ साथ आप तभी रचनात्मक हो पते हैं जब आप शांत हों तब दिमाग में नए नए विचार आते हैं।
Nature

Featured Post

Do you know ? क्या आप जानते है ? This skills help you to..!

अपनी आवाज को टाइपिंग में बदलें। अगर आप एक ब्लॉगर हैं या लेखक हैं तो यह वीडियो आपकी मदद कर सकता है। इस वीडियो के अंदर मैं आपको यह बता रह...