Monday, January 30, 2017

Rani Padmavati and Bhansali

अभिवक्ति की स्वतंत्रता वही तक सिमित है जहाँ पर दूसरे की स्वतंत्रता शुरू हो जाती है।  रानी पद्मिनी को लेकर जो बवाल मचा है, उस के संदर्भ में यह लेख उद्रित है। अपने बहूत सारे लाभ के लिए फ़िल्मकार ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़खानी करते आये है। इसके पीछे बनने वाली फिल्म का प्री प्रचार है। रानी पद्मिनी के साथ समुदाय विशेष के साथ ऐतिहासिकता भी जुडी हुई है। कैसे तथ्यों को तोड़ कर कोई किसी की भावनाओ के साथ खिलवाड़ कर सकता है? अगर किसी फिल्म के प्रोड्यूसर, हीरो, या किसी भी तरह के व्यक्ति जो उस फिल्म से जुड़ा हुवा है, को इस तरह की अप्रिय घटना का सामना करना पड़ता है, तो इसके लिए वह स्वयं दोषी है। फिल्म से जुड़े हुए लोगो को रानी व उस समय के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। अपने लाभ के लिए इतिहास के साथ छेड छाड़ नहीं करनी चाहिए। अपनी रचना से समाज को सन्देश दे रहे है, तो समाज के हर वर्ग व भावी पीढ़ी का ख्याल रखना चाहिए। रानी पद्मिनी की कहानी को पहले ही बहूत तोड़ मरोड़ कर, काल्पनिक रूप से लिखा गया है। लेकिन फ़िल्मकार जो बताना चाह रहा है, वह तो मुस्लिम इतिहासकारों ने भी नहीं लिखा।

रानी पद्मिनी की कहानी इतिहासकारों की नजर में।
  
रानी पद्मिनी सिंघल द्वीप जो वर्तमान श्रीलंका में है वहां के सिंघल राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी थी। पद्मिनी अद्वितिय सुन्दर थी।
चितोड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी। 

फरिश्ता ने चित्तौड़ की चढ़ाई 1303  के लगभग 300 वर्ष बाद और जायसी की पद्मावत में (रचनाकाल 1540 ई.) की 70 वर्ष पश्चात् सन् 1610 में पद्मावत के आधार पर इस वृत्तांत का उल्लेख किया जो तथ्य की  दृष्टि से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।
दूसरेइतिहासकार ओझा का कथन है कि पद्मावत, तारीखे फरिश्ता और अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टाड के संकलनों में तथ्य केवलयहीं है कि चढ़ाई और घेरे के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को विजित किया, वहाँ का राजा रत्नसेन मारा गया और उसकी रानी 
पद्मिनी ने राजपूत स्त्रियों के साथ जौहर की अग्नि में अपने आप की आहुति दी। इसके अतिरिक्त अन्य सब बातें कल्पित हैं। 
रतन सिंह के दरबार में राघव नाम का एक पंडित था, जो असत्य भाषण के कारण रतनसिंह द्वारा निष्कासित होकर तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन की सेवा में जा पहुँचा और जिसने उससे पदमावती के सौंदर्य की बड़ी प्रशंसा की। अलाउद्दीन पदमावती के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुनकर उसको प्राप्त करने के लिये लालायित हो उठा और उसने इसी उद्देश्य से चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। दीर्घ काल तक उसने चित्तौड़ पर घेरा डाले रखा, किंतु कोई सफलता होती उसे न दिखाई पड़ी, इसलिये उसने धोखे से रतनसिंह राजपूत को बंदी करने का उपाय किया। उसने उसके पास संधि का संदेश भेजा, जिसे रतन सिंह राजपूत ने स्वीकार कर अलाउद्दीन को विदा करने के लिये गढ़ के बाहर निकला, अलाउद्दीन ने उसे बंदी कर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया। 
जिस समय वह दिल्ली में बंदी था, कुंभलनेर के राजा देवपाल ने पदमावती के पास एक दूत भेजकर उससे प्रेमप्रस्ताव किया था। रतन सिंह राजपूत से मिलने पर जब पदमावती ने उसे यह घटना बताई तो, वह चित्तौड़ से निकल पड़ा और कुंभलनेर जा पहुँचा। वहाँ उसने देवपाल को द्वन्द युद्ध के लिए ललकारा। उस युद्ध में वह देवपाल की सेल से बुरी तरह आहत हुआ और यद्यपि वह उसको मारकर चित्तौड़ लौटा किंतु देवपाल की सेल के घाव से घर पहुँचते ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। पदमावती और नागमती ने उसके शव के साथ चितारोहण किया। अलाउद्दीन भी रतनसिंह राजपूत का पीछा करता हुआ चित्तौड़ पहुँचा, किंतु उसे पदमावती न मिलकर उसकी चिता की राख ही मिली।

                                                                                


Saturday, January 28, 2017

शेखावाटी-नवलगढ़

शेखावाटी की झलक नवलगढ़। 

नवलगढ़ क़स्बा आज के बावड़ी गेट , नानसा गेट, अगुणा दरवाजा, मण्डी गेट इन चार दरवाजो के मध्य बसा हुवा था।  18 वी सदी में ठाकुर नवल सिंह ने इस कस्बे की स्थापना की थी। जो आज राजस्थान के शेखावाटी में स्थित है। नवल सिंह शेखावाटी के नवलगढ़ और मंडावा प्रांत के शासक थे।

1836 में बनी नवलगढ़ की हवेलियों पर चित्रकारी बहुत ही कुशलता पूर्वक की गई है। इसके अलावा 1920 में बनी पोद्दारो की हवेली और बाला किला, (जिसे स्थानीय लोग कचिया गढ़ भी कहते है, क्योंकि इस पर चारो तरफ कांच जड़ा हुवा था।) जिसकी दीवारों पर लोक कहानियां चित्रित है, सैलानियों को अपनी और आकर्षित करती है। इसके अतिरिक्त जोधराज पाटोदिया हवेली, बंसीधर भगत हवेली, सेकसरिया हवेली, जैपुरिया हवेली, चोखानी हवेली, रूप निवास महल, गंगा मैया मंदिर, और ब्रिटिश क्लॉक टावर नवलगढ़ के अन्य आकर्षण है।

नवलगढ़ के शासक की एक कहानी 
राजस्थान के शेखावाटी अंचल के ठिकाने नवलगढ़, (झुंझनु जिले में) के शासक ठाकुर नवल सिंह शेखावत अपने खिराज मामले के साठ हजार रुपयों की बकाया पेटे बाईस हजार रूपये की हुण्डी लेकर दिल्ली जा रहे थे | उनका कारवां जैसे ही हरियाणा प्रान्त के दादरी कस्बे से गुजरा तो उन पर एक वैश्य महिला की नजर पड़ी| महाजन (वैश्य) महिला के घर उसकी पुत्री का विवाह था, वह शेखावाटी के कस्बे बगड़ सलामपुर की थी और उसके पीहर के सारे कुटुम्बी जन मर चुके थे। पीछे कोई बाकी नहीं बचा था। दादरी वाला महाजन यद्यपि अच्छा धनाढ्य व्यक्ति था। ठा. नवलसिंह उधर से निकले, उसके कुछ दिन बाद महाजन कन्या का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न होने वाला था। महाजन की पत्नी ने ठाकुर की शेखावाटी की वेशभूषा और कारवां देखकर जान लिया कि वे उसी की मातृभूमि के रहने वाले हैं। उन्हें देखते ही उसका हृदय भर आया और वह फूट-फूट कर रोने लगी। अपने भाग्य को कोसने लगी कि यदि आज उसके पीहरवालों में से एक भी बचा हुआ होता, तो वह इसी वेषभूषा में उसकी पुत्री का भात भरने आता। यह एक ऐसा दिन होता है जब हर स्त्री अपने पीहर वालों को याद करती है। उसे रोती देखकर ठाकुर साहब ने पूछवाया कि क्यों रो रही है? जब उन्हें सारी बात का पता लगा तो उन्होंने उस महाजन पत्नी को कहलवाया- की “मैं ही तुम्हारा भाई हूँ और समय पर तुम्हारे घर भात भरने आऊँगा।" उसी वक्त वे उलटे पांव नवल गढ़ लौट आये। उन्होंने यह बात अपने घर में कही तो किसी को भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ और कुटुम्ब की दूसरी औरतें, उनके भोलेपन पर हँसने लगी। परन्तु ठा. नवलसिंह शेखावत ने जब अपना इरादा उक्त महाजन महिला को कहला भेजा, तो वे सभी आश्चर्य चकित रह गये। उधर महाजन महिला ने अपनी जातीय पंचायत बुलाकर ठाकुर साहब का स्वागत करने की तैयारी की। “ठा. नवलसिंह ने बाईस हजार रुपयों की हुण्डी, जो उस समय उनके पास थी, उस लड़की के मायरे में भेंट कर दी। जो खिराज के रूप में जमा कराना था, वो एक महिला के भाई बनकर उसकी पुत्री के विवाह में भात भरने में खर्च दिया। इस घटना से उस समय के शासकों की संवेदना को समझा जा सकता है। ठाकुर नवल सिंह शेखावत ने अपने क्षेत्र की महिला को अपनी बहन माना और उसके परिवार में किसी के न होने पर उसे जो दुःख हो रहा था वह दूर करने के लिए भात भरने की परम्परा निभाते हुये वह धन खर्च कर डाला जो उन्हें, राजकीय कोष में जमा कराना था। राजकीय कोष में उन्हें साठ हजार रूपये जमा कराने थे पर वे सिर्फ बाईस हजार रूपये की हुण्डी लेकर जमा कराने जा रहे थे, जो जाहिर करता है कि उनके राजकोष की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। साथ ही दिल्ली सल्तनत में समय पर खिराज जमा नहीं कराने पर सीधे सैनिक कार्यवाही का सामना करना पड़ता था। लेकिन ठाकुर नवल सिंह शेखावत ने दिल्ली सल्तनत की तरफ से संभावित किसी भी सैन्य कार्यवाही के परिणाम की चिंता किये बगैर उक्त महिला का भाई बनकर उसकी पुत्री के विवाह में भात भरते हुए बाईस हजार रूपये भेंट कर दिए। जो उनकी संवेदनशीलता प्रदर्शित करता है।

नवल गढ़ कैसे पहुंचे 
नवलगढ़ पहुँचने के लिए आप देश के किसी भी कोने से वाया जयपुर होकर आसानी से पहुँच सकते हैं। जयपुर से राजस्थान लोक परिवहन की बस आप को मुश्किल से 3 घंटे के सफर के बाद नवलगढ़ पहुँचा देगी। जयपुर से नवलगढ़ की दूरी लगभग 165 KM है। रेल मार्ग अभी आमान परिवर्तन के कारण अवरूद्ध है। 
अगर आप देहली की तरफ से आते है तो वाया रेवाड़ी होकर आ सकते है। देहली से नवलगढ़ लगभग 275 KM है।


  

Thursday, January 26, 2017

68 वें गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें !

68 वें गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें !
दोस्तों आज हम 68 वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं।  एक तरह से देखा जाये तो हमारा गणतंत्र वृद्धावस्था की और बढ़ रहा है। अगर पीछे मुड़कर देखें तो ? क्या पाया? ये एक ज्वलंत प्रश्न खड़ा दिखता है। अपने समाज में, सोसायटी में जो असन्तुलन की खाई है, वो बढती जा रही है।  तमाम कोशिशों के बावजूद हम आज भी देश से गरीबी को नहीं मिटा पाएं है। गरीबी तो दूर की बात है, हम मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं जूता पाएं है।

गरीबी भारत में चारों तरफ फैली हुई  है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से, गरीबी का प्रसार चिंता का विषय है। ये 21वीं शताब्दी है, और गरीबी आज भी लगातार बढ़ रही गंभीर खतरा है। 1.30 बिलियन जनसंख्या में से 29.7% से भी अधिक जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे है। ये ध्यान देने वाली बात है कि पिछले दशकों में गरीबी के स्तर में गिरावट हुई है लेकिन अमीरों और गरीबों के बीच की रेखा को पूरी तरह से धुंधला करने के प्रयासों का कड़ाई से अनुसरण करने की आवश्यकता है। एक राष्ट्र का स्वास्थ्य, राष्ट्रीय आय और सकल घरेलू उत्पाद से अलग, यहाँ के लोगों के जीवन स्तर से भी निर्धारित होता है। इस प्रकार, गरीबी किसी भी राष्ट्र के विकास में धब्बा बन जाती है।

यूँ तो भारत में एक से बढ़कर एक अमीर भी है।  अभी अपन ने नोट बंदी के दौरान ये दृश्य देखें है। लेकिन क्या कोई ये अनुमान लगा सकता है की हम अभावों में जीने के आदि हो गएँ हैं।  हाँ हम ऐसे हो गएँ हैं। हमें बना दिया गया है। या कुछ और कह लो।  लेकिन ये सचाई है, क्योंकि अगर मेरा पेट भर गया तो मुझे भूख दिखाई नहीं देगी। मैं कल के इंतजाम भी आज ही कर लेना चाहता हूँ।  चाहे कोई भूखा सोये मेरे को कोई मतलब नहीं है।  ये ये सोच हो गयी है, हमारी। 

हरित क्रांति को याद करिये।  हम भूखों मरने के कगार पर थे।  वो एक सद्प्रयास ही था इस दिशा में। आज हमें वैसे ही प्रयासों की जरुरत है। एक क्रांति और। गरीबी हटाने को लेकर पूरी ईमानदारी के साथ। 
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ने कहा है कि देश के ग्रामीण इलाकों में सबसे निर्धन लोग औसतन महज 17 रुपये प्रतिदिन और शहरों में सबसे निर्धन लोग 23 रुपये प्रतिदिन में जीवन यापन करते हैं।

अखिल भारतीय स्तर पर औसतन प्रति व्यक्ति मासिक खर्च ग्रामीण इलाकों में करीब 1,430 रुपये, जबकि शहरी इलाकों में 2,630 रुपये रहा। एनएसएसओ ने कहा, इस प्रकार से शहरी इलाकों में औसत प्रति व्यक्ति मासिक खर्च, ग्रामीण इलाकों के मुकाबले करीब 84 प्रतिशत अधिक रहा।
ग्रामीण भारतीयों ने 2014-15 के दौरान खाद्य पर आय का औसतन 52.9 प्रतिशत खर्च किया, जिसमें मोटे अनाज पर 10.8 प्रतिशत, दूध और दूध से बने उत्पादों पर 8 प्रतिशत, पेय पर 7.9 प्रतिशत और सब्जियों पर 6.6 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। गैर-खाद्य वस्तुओं के वर्ग में खर्च में घरेलू उद्देश्यों के लिए ईंधन और बिजली (परिवहन खर्च छोड़कर) पर खर्च आठ प्रतिशत, कपड़ा एवं जूता-चप्पल पर सात प्रतिशत, दवा इलाज पर 6.7 प्रतिशत, शिक्षा पर 3.5 प्रतिशत खर्च किया गया।


हमें गरीबी हटाने के लिए अमीरों की तरह नहीं गरीबों की तरह सोचना होगा। कैसे ? ऐसे जब एक गरीब किसी अमीर को देखता है उसके लक्सरी, ऐसो आराम के साधनों की तरफ देखता है तो उस के मन में क्या विचार आता है। यहीं विचार सरकारों व् अमीरो के मन में आएगा तो कुछ सकारात्मक कदम उठाये जा सकते है। जब कोई गरीब दिखाई दे तो हमें ये सोचना होगा की उसकी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ में कैसे कर सकता हूँ।   की ये की में और अमीर कैसे बन सकता हूँ। सरकारों ने जहाँ पर मरहम लगाने की जरुरत थी, इन 68 वर्षों में वहां लगाकर कहीं और ही लगाया है। 



वहीं दूसरी ओर, आबादी के शीर्ष पांच प्रतिशत का प्रति व्यक्ति मासिक खर्च ग्रामीण इलाकों में 4,481 रुपये, जबकि शहरी इलाकों में 10,282 रुपये रहा। एनएसएसओ की विज्ञप्ति में कहा गया है कि उसका 68वां सर्वेक्षण ग्रामीण इलाकों में 7,496 गांवों और शहरों में 5,263 इलाकों के नमूनों पर आधारित है।

पता नहीं अच्छे दिन कब आएंगे।  
लेकिन आज भी अमीरों से ज्यादा उल्लास गरीबों में है। 
उन्होंने अनुकूलन की परिभाषा जन्म से ही सीखी हुयी है। 
कृतज्ञ राष्ट्र के हर उत्सव में बढ़ चढ़कर भाग लेते है। 







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